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US Election: पिछले चुनाव में कम वोट पाकर भी जीत गए थे ट्रंप, क्या फिर चौंकाएंगे?

nationfirst.in

12 Oct 2020 10:56 AM 

2016 का अमेरिकी चुनाव कई वजहों से चर्चा में रहा. पहली बार कोई महिला राष्ट्रपति बनने के इतने करीब पहुंची. रूस का अमेरिकी चुनाव में हाथ खुलकर सामने आ गया. और अंत में एक ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति बन गया, जिसके खिलाफ खुलकर इतना माहौल बन चुका था.

भारत में जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख नज़दीक आ रही है, वैसे ही दुनिया की हलचल भी बढ़ रही है. वो इसलिए क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तारीख भी नज़दीक है. 3 नवंबर को अमेरिकी जनता अपना राष्ट्रपति चुनेगी. डोनाल्ड ट्रंप और जो बिडेन में से कौन अगले चार साल तक अमेरिका पर राज़ करेगा, इसकी तस्वीर साफ होगी. अभी अमेरिका में सारे सर्वे और पोल डोनाल्ड ट्रंप के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं और जो बिडेन को अगला राष्ट्रपति घोषित करते दिख रहे हैं.

लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के लिए ये नया नहीं है. क्योंकि साल 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में भी रुख कुछ ऐसा ही था. पिछले राष्ट्रपति चुनाव में पहले किसी को उम्मीद नहीं थी कि डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनेंगे, लेकिन वो बन गए. उसके बाद हर सर्वे हिलेरी क्लिंटन को ही चुनाव में आगे बता रहा था और उम्मीद जताई जा रही थी कि अमेरिका को पहली महिला राष्ट्रपति मिल सकती है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

क्या हुआ था 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में, कैसे हार कर जीत गए थे ट्रंप?

2016 का अमेरिकी चुनाव कई वजहों से चर्चा में रहा. पहली बार कोई महिला राष्ट्रपति बनने के इतने करीब पहुंची. रूस का अमेरिकी चुनाव में हाथ खुलकर सामने आ गया. और अंत में एक ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति बन गया, जिसके खिलाफ खुलकर इतना माहौल बन चुका था.

पिछले अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत कोई चमत्कार से कम नहीं थी. क्योंकि पॉपुलर वोट यानी जनता (3 नवंबर को जनता इसी के तहत वोट डालेगी) के द्वारा दिए गए वोट में वो काफी पीछे थे और हिलेरी क्लिंटन से मुकाबले में एक तरफा हार चुके थे. लेकिन जिस सिस्टम की कभी ट्रंप आलोचना करते थे, उसे इलेक्टोर कॉलेज की वजह से अंत में उन्हें जीत मिल गई थी.

कम वोट मिलने पर भी कैसे जीत गए थे ट्रंप?

अमेरिकी चुनाव भारत के चुनाव से काफी अलग है. यहां सीधे जनता अपना राष्ट्रपति नहीं चुनती है. जो वोट अमेरिकी जनता डालती है वो अपने राज्य और शहर के किसी रिप्रेंजेटिव को डालती है. यानी अगर भारत के हिसाब से तुलना करें तो किसी सांसद को. जो बाद में जाकर अमेरिकी संसद में राष्ट्रपति को चुनता है.

2016 के चुनाव में ऐसा ही हुआ, कुल वोटों की संख्या में तो क्लिंटन आगे हो गईं लेकिन जब इलेक्टोरल कॉलेज की बात आई तो उन्हें मात मिली. अमेरिका में कुल इलेक्टर की संख्या 538 है. जिनमें 100 सीनेटर, 435 रिप्रेंजेटेटिव और 3 इलेक्टर वॉशिंगटन डी.सी. से होते हैं.

कैसे इलेक्टर तय करते हैं कौन बनेगा राष्ट्रपति?

अमेरिकी संविधान के अनुसार, हर राज्य को जनसंख्या के हिसाब से वहां इलेक्टर की संख्या मिली होती है. जिस प्रकार भारत में हर राज्य की अपनी-अपनी लोकसभा सीटें होती हैं. तो अमेरिका में जनता सीधे अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार को वोट ना देकर उनके प्रतिनिधियों को वोट देती है. 3 नवंबर को होने वाली इस वोटिंग के बाद दिसंबर में अमेरिकी संसद राष्ट्रपति को चुनेगी.

किस राज्य में कितने इलेक्टर?

तब इन इलेक्टर का काम शुरू होता है. लेकिन यहां पर एक बात अलग है. कोई इलेक्टर अपनी पार्टी से दूसरे किसी उम्मीदवार के पक्ष में भी मतदान कर सकता है. यानी डेमोक्रेट्स का कोई इलेक्टर रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को वोट डाल सकता है. इसी वोटिंग के आधार पर 538 में से जिसके सबसे अधिक वोट होते हैं, वही राष्ट्रपति बन जाता है. अभी अमेरिका में कैलिफॉर्निया और टेक्सास ऐसे राज्यों में हैं, जहां सबसे अधिक इलेक्टर हैं.

क्या फिर इतिहास रचेंगे ट्रंप?

अब एक बार जब चुनाव करीब हैं तो हर किसी की नज़र नतीजों पर हैं. इसलिए अमेरिकी चुनाव में पॉपुलर वोट से अधिक स्विंग राज्यों यानी ऐसे राज्यों पर नज़र है जहां इलेक्टर्स की संख्या अधिक है. डोनाल्ड ट्रंप फिर रेटिंग्स, पोल में पीछे हैं. अगर इस बार फिर वो जनता के वोटों में पीछे रह जाते हैं तो फिर एक बार उनकी उम्मीदें इन्हीं इलेक्टोरल वोट सिस्टम पर होगी.

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